कानपुर, एटीएस द्वारा गिरफ्तार किए गए कुर्बान अली और उसका गिरोह लामा और बेरेटा कंपनियों के नाम का प्रयोग कर अत्याधुनिक हथियार बना उन्हें ऊंचे दामों पर बेचता था।
यह ऐसा गिरोह था, जिसके असलहे आम लाइसेंसी शस्त्र धारकों के अलावा अपराधियों व आतंकियों तक सप्लाई होते थे। नौ साल पहले जब इस गिरोह का पर्दाफाश हुआ तो इससे मिले सबक को देखते हुए शस्त्र लाइसेंस के कई नियमों में बदलाव तक करने पड़े थे।
पुर्जे लाकर यहां निर्माण करते थे
लामा और बेरेटा लाइसेंसी व प्रतिबंधित बोर के विदेशी असलहे निर्माण करने वाली नामी कंपनियां हैं गिरोह में एल्विन नाम का एक सदस्य था जो कि तत्कालीन समय इंडियन एयरलाइंस से जुड़ा हुआ था। गिरोह के लोग उसकी ही मदद से सिंगापुर व कनाडा से विदेशी असलहों के पुर्जे लाकर यहां निर्माण करते थे। गिरोह के तार मुंबई, कोलकाता और हरियाणा तक जुड़े हुए थे। कंट्री मेड और मुंगेर में बनी पिस्टलों पर मेड इन यूएसए या मेड इन जर्मनी लिख कर पिस्टल या रिवाल्वर बेचने का धंधा खूब फलता फूलता रहा है, लेकिन उस वक्त यह पहली बार प्रकाश में आया था कि विदेशी कलपुर्जों की मदद से विदेशी मेड हथियार बनाकर उन्हें 15 से 20 लाख रुपये तक में बेचा जा रहा हो। इतना ही नहीं अवैध असलहों को कूटरचित दस्तावेजों के सहारे वैध भी बना दिया जाता था। इस गिरोह में लखनऊ, कानपुर, बरेली के शस्त्र विक्रेताओं के अलावा ग्वालियर व औरैया के लाइसेंसी शस्त्र विक्रेताओं के नाम प्रकाश में आए थे।
शस्त्र लाइसेंस एक ही यूनिक आइडी में चढ़ाए जाते
लाइसेंस में यूनिक आइडी का प्रयोग किया जाने लगा। अगर कोई व्यक्ति एक से अधिक असलहे लेता तो शस्त्र लाइसेंस एक ही यूनिक आइडी में चढ़ाए जाते। पूर्व में एक ही लाइसेंस पर कई असलहे कूटरचित दस्तावेजों के सहारे रखने के मामले प्रकाश में आए। बाहर से शस्त्र खरीदने पर ट्रांसपोर्टेशन लाइसेंस की सुविधा समाप्त कर दी गई।
इसलिए थी इन हथियारों की मांग
देश में वर्ष 1983 से विदेशी हथियारों का निर्यात बंद है। केवल वहीं विदेशी असलहे खरीदे बेचे जा रहे हैं, जो पूर्व में लोगों के पास हैं। गिरोह नामी कंपनियों के हूबहू असलहे बनाकर निस्प्रयोज्य असलहों का नंबर डालकर उन्हें वैध करके ऊंचे दामों पर बेचता था। लोग उन्हें असली समझकर खरीदते थे। अपराधी गैंगों के अलावा आतंकियों में भी इन असलहों की खूब मांग थी।